Home उत्तराखण्ड क्यूँ बने धामी भाजपा आलाकमान की पसंद और क्यूँ अनुभवी नाम हुए दरकिनार ?

क्यूँ बने धामी भाजपा आलाकमान की पसंद और क्यूँ अनुभवी नाम हुए दरकिनार ?

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अनुभवी नामों को दरकिनार कर युवा पुष्कर धामी पर दांव लगाना, सूबे के दो दशकों के इतिहास में राजनैतिक तौर पर अब तक का सबसे साहसिक कदम माना जा रहा है | क्यूंकि संघटन और राजनीति में पारंगत धामी की प्रशासनिक क्षेत्र में महारथ का सामने आना बाकी है | लिहाजा उनकी सीएम पद की इस छोटी पारी की बड़ी सफलता, सूबे में पार्टी की भावी राजनीति में दूरगामी बदलाव ला सकती है | फिलहाल इन सबसे अलग, विषयानरूप अभी हम समझने का प्रयास करते हैं कि पुष्कर का पार्टी शीर्ष नेत्रत्व की पसंद बनने की क्या रही अहम वजह

राजनीति और संघटन का माहिर खिलाड़ी होना –

धामी खटीमा विधानसभा से दो बार से विधायक हैं, जानकार का तो यहाँ तक कहना है कि इससे पूर्व भी उन्हे टिकट मिलता तो वह तीन बार के विधायक होते | संगठनिक अनुभव के रूप में आज भी पार्टी में उनके युवा मोर्चा कार्यकाल में हुए जन आंदोलनों की सफलता को नज़ीर मानकर चर्चा होती है |

कोशियारी का अपनी इस राजनैतिक विरासत की दिल्ली में पैरवी करना –

धामी, प्रदेश भाजपा की राजनीति के धुरंधर पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोशयारी के राजनैतिक दत्तक पुत्र माने जाते हैं | उनकी कार्यशैली में भगत दा की राजनैतिक छाप का होना और अब दिल्ली में स्वयं कोशियारी का उनकी जबर्दस्त पैरवी ने चयन में महत्वपूर्ण रोल निभाया |

गढ़वाल में पूर्व सीएम और भावी सीएम की लंबी फेहरिस्त का होना –

जगजाहिर है कि कोशियारी के बाद से सीएम पद रेस में जीतने और हारने वाले सभी खिलाड़ी मूलत गढ़वाल से ही आते हैं | चाहे वह पूर्व सीएम खंडुरी हों, निशंक हों, त्रिवेन्द्र हों, तीरथ हों या  तमाम सीएम दावेदार  सतपाल महाराज, अनिल बलूनी, धन सिंह रावत, हरक सिंह रावत ….लंबी फेहरिस्त है | इन सभी हैवीवेट राजनेताओं की राजनैतिक जमीन एक होने के कारण इनमें किसी एक की भी ताजपोशी बाकी सभी की राजनीति को प्रभावित करती है | जिसका खामियाजा चुनाव में समय कम रहने के कारण अंतिम रूप से पार्टी को हो सकता था |

क्षेत्रीय और जातिगत संतुलन बनाना –

पार्टी के लिए गढ़वाल-कुमायूं और ब्राह्मण-राजपूत का संतुलन साधना भी जरूरी था | चूंकि निशंक केंद्र में मंत्री और मदन कौशिक प्रदेश अध्यक्ष, दोनों ब्राह्मण जाति और गढ़वाल मण्डल से आते हैं, ऐसे में कुमायूं से किसी राजपूत चेहरे को लाना जरूरी था | काबीना मंत्री विशन सिंह चुनफाल के नाम पर सहमति नहीं बनना धामी के पक्ष में गया |

पार्टी का धामी की सफलता से तमाम राजनैतिक महत्वाकांशाओं के लिए बड़ी लकीर खीचना – पार्टी के शीर्ष नेत्रत्व के एक बड़े तबके की राय है कि धामी जैसे युवा चेहरे की सीएम पद पर सफलता लंबे समय के लिए सूबे की राजनैतिक खीचतान को बेहद कम कर सकती है | क्यूंकि बाकी सभी सीएम दावेदार धामी के मुक़ाबले उम्र में काफी बड़े हैं और युवा नेताओं में कोई भी धामी के आसपास भी नहीं ठहरता | लिहाजा पार्टी के इस सीएम दांव की सफलता, गुटबाजी कम करने में मील का पत्थर साबित हो सकती है |

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