देहरादून

460 तक पहुंचा राजधानी दून का एक्यूआई

दीवाली की रात दमघोंटू हुई हवा, उत्तराखंड में अब तक का सबसे प्रदूषित पल

आज बात करेंगे उस हवा की, जिसे आप अपने फेफड़ों में भरते हैं बिना यह जाने कि उसमें क्या-क्या भरा हुआ है।
दीवाली आई, दीए जले, मिठाई बटी और साथ में जलीं वो चीज़ें भी जिन्हें जलाना अब बस परंपरा भर रह गया है और वो है पटाखे।
दीवाली की रात, जब आप खुशियां मना रहे थे, उसी वक्त दून यूनिवर्सिटी के आसमान में जहर तैर रहा था। 20 अक्तूबर की रात साढ़े बारह बजे एयर क्वालिटी इंडेक्स (एक्यूआई) 460 तक पहुंच गया। आप समझिए, यह महज़ एक संख्या नहीं है यह उस हवा का चेहरा है, जो आपकी सांसों में घुल रही है।
उत्तराखंड बनने के बाद यह पहली बार हुआ, जब राज्य के किसी इलाके में एक्यूआई ने 460 का आंकड़ा पार किया। इसे रिकॉर्ड मत समझिए, इसे चेतावनी समझिए।
अब देखिए, विशेषज्ञ क्या कह रहे हैं।
डॉ. विजय श्रीधर दून विश्वविद्यालय के पर्यावरण विभाग के एचओडी, साफ कह रहे हैं कि यह प्रदूषण आतिशबाजी की देन है। और यही बात थर्ड पार्टी रियल टाइम मॉनीटरिंग सिस्टम भी कह रहा है, जो घंटाघर और नेहरू कॉलोनी जैसे इलाकों में लगा हुआ है।
आप सोचिए, जब दिल्ली का औसत एक्यूआई 351 रहा, तब दून ने 460 की छलांग लगाई। लेकिन ठहरिए, थोड़ा सुकून भी है। ये स्थिति ज़्यादा देर नहीं रही। रात दो बजे के बाद एक्यूआई फिर गिरने लगा और 200 से नीचे आ गया। शायद हवा को भी समझ में आ गया कि इंसान कब सुधरने वाला नहीं है, उसे ही हटना पड़ेगा। डॉ. पराग मधुकर धकाते, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सचिव, बता रहे हैं कि जागरूकता अभियान चलाया गया, उपाय किए गए। इसलिए कुछ शहरों ने संयम बरता। टिहरी का एक्यूआई 66 रहा जो पिछले साल 93 था। नैनीताल भी थोड़ी राहत में रहा, वहाँ 111 रहा जो पहले 119 था। दून में औसत एक्यूआई इस बार 204 रहा जबकि पिछले साल यह 288 था। यानी लोगों ने थोड़ी समझदारी दिखाई या शायद हवा ने थोड़ी दया की। ऋषिकेश और हल्द्वानी में प्रदूषण का स्तर बढ़ा। ऋषिकेश का एक्यूआई 135 रहा, हल्द्वानी 198 पर पहुंच गया। अब आप सोचिए कि पर्वतों की गोद में बसे इन शहरों में भी हवा दम तोड़ रही है।
अब सवाल ये है कि हम हर साल यही रिपोर्ट पढ़ते रहेंगे? या फिर वाकई कुछ बदलने की कोशिश करेंगे? क्या अगली दीवाली तक हम ये सोच पाएंगे कि ‘खुशी मनाने का मतलब किसी की सांस रोक देना नहीं होता’?

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