देहरादून

वर्ष 2025 का मानसून छोड़ गया न मिटने वाले जख्म

कहीं मां-बाप खोए, कहीं बच्चे... चीखती रही धरती, खामोश रहा इंसान

नवीन यादव

उत्तराखंड समेत पूरे हिमालयी राज्यों ने वर्ष 2025 के मानसून के दौरान जो त्रासदी झेली, उसने हजारों परिवारों को असहाय और बेसहारा कर दिया। किसी ने अपने मां-बाप को खोया, किसी ने अपने बच्चों को, और कई ऐसे दृश्य भी सामने आए जो शब्दों से बयां नहीं किए जा सकते। बारिश के साथ आई तबाही ने केवल जीवन और संपत्ति ही नहीं छीनी, बल्कि कई लोगों से उनका भविष्य भी छीन लिया।
यह आपदा केवल ‘दुर्घटना’ नहीं थी। यह उस अपराध का परिणाम थी जो वर्षों से प्रकृति के साथ किया जा रहा है। विकास के नाम पर पहाड़ों को काटा गया, नदियों के रास्ते बदले गए, जंगलों की बलि दी गई और परिणामस्वरूप प्रकृति ने अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए चेतावनी दे दी।
कहावत है कि गलती इंसान से होती है, लेकिन जब वही गलती बार-बार स्वार्थवश दोहराई जाए तो वह अपराध बन जाती है। चाहे वह अपराध मनुष्य करे, पशु पर करे या प्रकृति पर परिणाम भुगतना ही पड़ता है। खामोश रहने वाला समाज भी इस अपराध का भागीदार होता है।
शहरों में ‘स्मार्ट सिटी’ का सपना दिखाया गया, लेकिन उसके पीछे की सच्चाई भयावह रही। छोटे-छोटे नाले और नहरें बंद कर दी गईं, जिनका अस्तित्व अब केवल कागजों में है। शहरों में ऊंची-ऊंची सड़कों के किनारे ऐसी नालियां बनाई गईं जो पानी का निकास नहीं, संग्रहण करती हैं। परिणामस्वरूप मामूली बारिश भी शहर को तालाब में बदल देती है।
सड़क चौड़ीकरण के नाम पर पहाड़ों को बेरहमी से काटा गया। लेकिन कटा हुआ मलबा कहां गया? ना कोई डंपिंग जोन बना, ना ही मलबे का सही निस्तारण हुआ। कंपनियों और ठेकेदारों ने मलबा सीधे नदियों में डाल दिया, जिससे जलधाराएं अवरुद्ध हुईं और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हुई।
अब सवाल उठता है कि क्या संबंधित अधिकारियों ने अपने कर्तव्यों का पालन किया? क्या उन्होंने निर्माण कार्यों की निगरानी की? या फिर कंपनियों की मिठाइयों और ठंडी हवा में बैठे-बैठे केवल कागजों पर साइन कर दिए? अगर निगरानी होती, तो मलबा नदियों में न पहुंचता, और न ही लोगों की जान जाती।
जहां एक ओर कुछ सच्चे पर्यावरण प्रेमी विकास के नाम पर हो रहे विनाश के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों ने पर्यावरण संरक्षण को भी ‘धंधा’ बना लिया है। दिखावे की संगोष्ठियां, भारी फंडिंग और शून्य कार्य यही इनका एजेंडा है। सच्चे कार्यकर्ताओं की आवाज को दबाने के लिए इन्हें आगे किया गया है।
वर्ष 2025 की मानसूनी तबाही एक चेतावनी है कि अगर अब भी नहीं चेते, तो विनाश और भी भयावह होगा। हमें अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। सरकार, प्रशासन, आम जनता और मीडिया सभी को मिलकर यह तय करना होगा कि विकास का मार्ग केवल प्रकृति को नष्ट कर नहीं चलाया जाएगा।
क्योंकि अगर हमने प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद नहीं किया, तो प्रकृति हमें माफ नहीं करेगी। कुल मिलाकर
हम जब तक यह नहीं मानेंगे कि यह ‘दैवीय आपदा’ नहीं, बल्कि ‘मानवजनित अपराध’ है तब तक समाधान संभव नहीं है। हमें विकास के मॉडल को फिर से सोचने की जरूरत है, ताकि पर्यावरण और मानव जीवन दोनों सुरक्षित रह सकें।

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