विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य का भावनात्मक संबोधन

देहरादून की हवा में उस दिन एक विशेष गूंज थी। उत्तराखंड विधानसभा के इतिहास में शायद यह पहली बार था जब सभागार में नारे, विरोध या कोलाहल नहीं, बल्कि हिमालय की शांत, सधी हुई आत्मा की तरह शब्द बह रहे थे। मंच पर महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु बैठी थीं और उनके सामने खड़े थे नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, जिनकी वाणी में राजनीति कम, पहाड़ की मिट्टी की गंध ज़्यादा थी।
आर्य ने जब कहा महामहिम, आप भी प्रकृति की बेटी हैं, तो पूरा सदन एक क्षण को ठहर गया। उन्होंने उड़ीसा के सिमलीपाल का ज़िक्र किया वह जगह जहां से राष्ट्रपति आई हैं, और उसे उत्तराखंड के जंगलों से जोड़ा। यह एक राजनीतिक भाषण नहीं था, बल्कि दो पहाड़ों के बीच संवाद जैसा था एक हिमालय का और दूसरा सिमलीपाल का।
यशपाल आर्य का यह वाक्य सदन में देर तक गूंजता रहा उत्तराखंड की महिलाएं जंगलों को अपना मायका समझती हैं। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे चमोली की गौरा देवी ने 1974 में पेड़ों से लिपटकर ‘चिपको आंदोलन’ की नींव रखी थी। उनकी आवाज़ में उस संघर्ष की आंच थी, जो आज भी राज्य की पहाड़ी औरतों के चेहरे पर साफ दिखती है धूप में तपी, पर हारी नहीं।
आर्य ने उत्तराखंड की पहचान को सिर्फ देवभूमि तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने कहा हमारी नदियां सिर्फ पानी नहीं लातीं, वे सहिष्णुता और गंगा-जमुनी संस्कृति का संदेश भी लाती हैं। उन्होंने नैनीताल के तालों से लेकर हेमकुंड साहिब और नानक मत्ता, रुड़की की पीरान कलियर दरगाह तक धर्म और संस्कृति के उस रंगीन गुलदस्ते की तस्वीर खींची जिसमें सबका स्थान है।
लेकिन यशपाल आर्य का भाषण सिर्फ भावनाओं का सिलसिला नहीं था। उन्होंने ठोस सवाल रखे हमारे जंगल देश-दुनिया के पर्यावरण की रक्षा कर रहे हैं, पर उन्हीं जंगलों से जंगली जानवर खेतों को बरबाद कर रहे हैं। वन कानून हमारे लोगों को डराता है, अधिकार नहीं देता।
उन्होंने याद दिलाया कि 2006 से लागू वनाधिकार कानून पर अब तक उत्तराखंड में मुश्किल से दर्जनभर मामलों में ही अधिकार दिए गए हैं, जबकि दूसरे राज्यों में लाखों लोगों को लाभ मिला। आर्य ने कहा 65 प्रतिशत भूमि वन क्षेत्र में है, लेकिन हमारे लोग आज भी भूमिहीन हैं।
उन्होंने उस दर्द को भी आवाज़ दी जो हर पहाड़ी घर में छिपा है खाली गांव, बंद मकान और ढहते खेत।
पर्वतीय पुरुष शहरों में मजदूर बन गया है, और खेतों में अब औरतें अकेले जुत रही हैं। हमारी महिलाएं ही आज खेती, पशुपालन और परिवार सबका बोझ उठा रही हैं।
आर्य का यह हिस्सा किसी आर्थिक रिपोर्ट जैसा नहीं था, बल्कि समाज की आंखों में झांकता हुआ सच था।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा शिक्षा और स्वास्थ्य आज भी हमारे पहाड़ की सबसे बड़ी चुनौती हैं। स्कूल हैं, पर शिक्षक नहीं। अस्पताल हैं, पर डॉक्टर नहीं। उन्होंने तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि अगर युवाओं को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप शिक्षा दी जाए, तो वे पलायन नहीं करेंगे, बल्कि गांवों में ही आत्मनिर्भर बनेंगे।
अपने भाषण के अंतिम हिस्से में यशपाल आर्य ने राष्ट्रपति मुर्मु से कहा हम आपसे सिर्फ आशीर्वाद नहीं, मार्गदर्शन चाहते हैं। हमें बताइए कि कैसे प्रकृति के साथ विकास की राह निकले। आपके सान्निध्य से हमें दिशा मिलेगी।
उनकी आवाज़ में विनम्रता थी, पर शब्दों में आत्मविश्वास। उन्होंने पूरे सदन की ओर इशारा करते हुए कहा यह हमारा अहोभाग्य है कि देवभूमि की विधानसभा में आज प्रकृति की बेटी का सान्निध्य मिला है।
कुल मिलाकर नेता प्रतिपक्ष का य़ह संबोधन सिर्फ एक नेता का भाषण नहीं था यह उत्तराखंड की आत्मा की पुकार थी। यशपाल आर्य ने विकास और प्रकृति के बीच संतुलन की बात की, जंगल और महिला को एक ही संवेदना से जोड़ा और बताया कि देवभूमि सिर्फ मंदिरों का प्रदेश नहीं, बल्कि संघर्ष और सहिष्णुता का जीवंत प्रतीक है।
सदन से निकलते समय महामहिम राष्ट्रपति मुस्कुरा रही थीं शायद इसलिए कि उन्होंने एक ऐसे प्रदेश की आवाज़ सुनी, जो उन्हें प्रकृति की बेटी कहकर पुकार रहा था।



