देहरादून में 130 से ज़्यादा अर्ज़ियाँ और सवाल

कलेक्ट्रेट के उस हॉल में आज कोई भाषण नहीं था, कोई मंच नहीं था, कोई माइक पर तालियाँ नहीं थीं। वहाँ सिर्फ़ लोग थे अपनी फ़ाइलों के साथ, अपनी पीड़ा के साथ और इस उम्मीद के साथ कि शायद आज उनकी बात सुनी जाएगी। जन दर्शन कार्यक्रम था, अध्यक्षता कर रहे थे जिलाधिकारी सविन बंसल, और सामने थीं 130 से ज़्यादा शिकायतें। ये महज़ काग़ज़ नहीं थे, ये उन ज़िंदगियों की कहानियाँ थीं जिन्हें व्यवस्था अक्सर प्रक्रिया के नाम पर टाल देती है।
देहरादून ही नहीं, प्रदेश के दूसरे जिलों से भी लोग पहुँचे। किसी को अपनी ज़मीन का इंतज़ार था, किसी को बच्चों की पढ़ाई की चिंता, किसी को बीमारी ने तोड़ा था, तो किसी को अपने ही घर में बेसहारा छोड़ दिया गया था।
सहारनपुर रोड की 82 वर्षीय संतोष देवी की कहानी कोई अपवाद नहीं, बल्कि हमारे समाज का आईना है। पति की मौत के बाद उन्होंने अपनी संपत्ति बेटे के नाम कर दी यह सोचकर कि बुढ़ापे में सहारा मिलेगा। बेटा भी नहीं रहा। अब बहू है, लेकिन देखभाल नहीं है। जिलाधिकारी ने भरण-पोषण अधिनियम के तहत वाद दर्ज कराने के निर्देश दिए। सवाल यह है क्या किसी बुज़ुर्ग को न्याय पाने के लिए इतने दरवाज़े खटखटाने पड़ेंगे?
ओगल भट्टा की मोनिका, एकल माता। दो बेटियाँ हैं, पढ़ाई किसी वजह से रुक गई। प्रशासन ने प्रोजेक्ट नंदा-सुनंदा के तहत सहयोग का आश्वासन दिया। कमेटी बनेगी, परीक्षण होगा। काग़ज़ चलेंगे। उम्मीद है कि फ़ाइलों की रफ़्तार बच्चों के भविष्य से धीमी न पड़े।
झंडा मोहल्ला की रेणु देवी ने बेटी अनुष्का की शिक्षा और बेटे अर्णीत की स्कूल फ़ीस का सवाल रखा। बेटी के लिए नंदा-सुनंदा, बेटे के लिए स्कूल प्रबंधन से समन्वय ये छोटे-छोटे फैसले हैं, जो किसी परिवार की दिशा बदल सकते हैं।
टिहरी गढ़वाल के नरेंद्रनगर से आईं उमा रानी पिछले पाँच साल से पीजीआई चंडीगढ़ में इलाज करा रही हैं। कैंसर की पुष्टि हो चुकी है। बीमारी लंबी है, खर्च उससे भी लंबा। जिलाधिकारी ने राइफल क्लब फंड से आर्थिक सहायता के लिए पत्रावली प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। सवाल यह नहीं कि मदद मिलेगी या नहीं, सवाल यह है कि कब मिलेगी।
गांधीग्राम की सुनीता देवी के पति दस साल से बीमार हैं। मार्च में बेटी की शादी है। समाज कल्याण विभाग को शासन की योजनाओं से सहायता देने के निर्देश हुए। योजनाएँ हैं, लेकिन आम आदमी के लिए उनका रास्ता अक्सर भूलभुलैया जैसा है।
मालदेवता के गौरव पवार ने 18 महीने से अटके दाखिल-खारिज का मामला रखा। जन दर्शन में पहले ही चिन्हित, लेकिन पटवारी स्तर पर लंबित। जिलाधिकारी ने नाराज़गी जताई, अगले दिन तक रिपोर्ट मांगी और साफ कहा नहीं हुआ तो निलंबन की पत्रावली बनेगी। यह एक मामला नहीं, यह उस सिस्टम की कहानी है जहाँ एक दस्तख़त के लिए महीनों निकल जाते हैं।
जिलाधिकारी सविन बंसल ने साफ कहा जन समस्याओं के निस्तारण में लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी। हर शिकायतकर्ता को निस्तारण के बाद सूचना दी जाएगी। यह बात काग़ज़ पर अच्छी लगती है। असली परीक्षा इसके अमल में है।
जन दर्शन में कई विभागों के अधिकारी मौजूद थे राजस्व, शिक्षा, समाज कल्याण, प्रोबेशन, बिजली, एमडीडीए, पेयजल, लोनिवि। पूरा प्रशासन एक कमरे में था। सवाल यही है क्या जनता की बात वहीं तक सीमित रहेगी, या फ़ाइलों के साथ आगे बढ़ेगी?
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे ज़रूरी यही है कि जब जनता बोलती है, तो सत्ता सिर्फ़ सुनती ही नहीं समय पर जवाब भी देती है।



