राज्य गठन के 24 वर्ष, उभरा युवाओं का दर्द युवा
सपनों के राज्य और वर्तमान राज्य के बीच होता रहता है टकराव:युवा

देहरादून/ नवीन यादव,
राज्य निर्माण दिवस औरों के लिए समान्य सा दिन हो सकता है, लेकिन उत्तराखंड में रहने वाले यहां के वाशिंदों के लिए यह दिन खास महत्व रखता है और रखे भी क्यों नहीं, इसी एक दिन वो किसी न किसी बहाने उसके सपनों के राज्य और वर्तमान राज्य के बीच टकराव होता है, जो उसे बाकी पूरे साल खलता रहता है। खैर राज्य गठन के 24 साल क्या खोया, क्या पाया पर इस परम्परा से हटकर यानी नेता जी की टिप्पणी से इधर जनसामान्य की निकाह से बीते 24 सालो का लेखा जोखा जानने की कोशिश में पहली ही प्रतिक्रिया इतनी कसैली रही कि चाहकर भी इस लेख को कड़वाहट से महरूम नहीं रख पाए।
दिपावली की छुट्टियां बिताकर वापस नैनीताल लौट रहे छात्र आयुष रावत से जब हमने राज्य के 24 वीं वर्षगाँठ पर प्रतिक्रिया जाननी चाही तो प्रत्युत्तर में सवाल खड़ा करते हुए उन्होंने कहा कि साफ साफ क्यों

आयुष रावत
नहीं पूछते की क्या क्या खो चुके है इन बीते 24 सालो में, बकौल आयुष उत्तराखंड बनने कर बाद नेताओ और प्रभावशाली लोगों का ही विकास हुआ है, आम आदमी तो और अधिक हासिये पर पहुंचा है। हालात यह है कि राज्य में औद्योगिक आस्थानो की स्थापना होने के बावजूद उत्तराखंड के युवाओं को रोजगार के लिए दिल्ली, मुंबई का रुख करना पड़ रहा है। स्पष्ट रोजगार नीति के आभाव में युवा वर्ग के सामने उसका स्वागत करने के लिए उसका अंधकारमय भविष्य है।

देव सरकार
इसी क्रम में दूसरे युवा देव सरकार है। उनका में वे कहना है कि उन्होंने राज्य आंदोलन सक्रिय भागीदारी बेशक न की हो लेकिन एक खुशहाल उत्तराखंड का सपना जरूर देखते है।
अपनी बात को पुख्ता तरीके से रखते कहते है कि जब भी कोई नेता कहता है हुए कि राज्य के विकास की धारा तय करने में समय लगेगा क्योंकि नया राज्य है। उनका कहना है कि आखिर इस राज्य में नया है ही।

सुरेश सिंह
क्या सिवाय एक राजनीतिक परिसीमन के, ऐसा तो नहीं है कि राज्य बनने के बाद यहाँ पेड़ों ने उगना, नदियों ने बहना या जनजीवन ने जन्म लेना आरम्भ किया हो सब कुछ पहले से ही मौजूद था, आपको तो सिर्फ दिशा तय करनी थी इस राज्य की? फिर यह आडम्बर क्यों? इसका जबाव भी खुद ही देते हुए कहते है कि शायद हमारे शासकों की नियत में ही खोट था।
सुरेश सिंह का मानना है कि किसी भी सरकार ने इस बात पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया कि जनता ने अलग राज्य की मांग क्यों की थी। राज्य बनने का फायदा हुआ तो सिर्फ वोटों की राजनीति करने वाले और धन्ना सेठों का, उसके बाद भी 24 साल में आती जाती सरकारों ने आम जनता के हितों की बात करना तो दूर उनकी सुध तक लेने की जहमत नहीं उठाई। शहीदों के सपनों का राज्य आज भी एक सपना ही बनकर रह गया।
कुसुम लता बोडाई का कहना है कि भ्रष्टाचार राज्य की आत्मा बन गया है, पहाड़ के विकास का सपना महज सपना ही बनकर रह गया है। पहाड़ के गांव में आज भी सामंती दौर बदस्तूर जारी है। शिक्षा का सबसे बुरा हाल है। अस्पतालों के हाल बदत्तर है, राज्य की नीतियों में लोकतंत्र कम तानाशाही अधिक दिखाई देती है। राज्य की नीतियों को देखते हुए पलायन करने वाले युवक दुबारा यहाँ आना ही नहीं चाहते। कुल मिलाकर शहीदों की शहादत यूही जाया हो गई।

कुसुम लता बोडाई



