
देहरादून। उत्तराखंड क्रांति दल युवा प्रकोष्ठ के पूर्व केंद्रीय अध्यक्ष राजेंद्र सिंह बिष्ट ने आरोप लगाते हुए नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा है कि विधानसभा में राजपत्रित अधिकारी प्रथम श्रेणी पद पर आसीन कार्यरत मयंक सिंघल की नियुक्ति की जांच की जाये और उनके सभी शैक्षणिक दस्तावेज फर्जी है और एक सप्ताह के भीतर कार्यवाही नहीं की जाती है तो विधानसभा में इस अधिकारी को बैठने नहीं दिया जायेगा।
उन्होंने एलआईयू की भूमिका पर भी सवाल खड़े किये है जिन्होंने ठीक प्रकार से शैक्षणिक दस्तावेज की जांच नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि नियुक्ति देने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी ठोस कार्यवाही की जाये। यहां परेड ग्राउंड स्थित उत्तरांचल प्रेस क्लब में संबोधित करते हुए उन्होंने बताया कि विधानसभा में किस प्रकार से अवैध शैक्षणिक दस्तावेजों के माध्यम से प्रथम श्रेणी राजपत्रित अधिकारी पद पर मयंक सिंघल जैसे भ्रष्टाचारी अधिकारी को तैनाती दी गयी है और उन्होंने कहा कि मयंक सिंघल जो वर्ष 2006 में उप प्रोटोकॉल अधिकारी के रूप में विधानसभा में तदर्थ रूप से नियुक्त किया जाता है, विधानसभा सचिवालय सेवा नियम के अनुसार उप प्रोटोकॉल अधिकारी पद पर नियुक्ति हेतु स्नातक उपाधिधारण होना आवश्यक आर्हता है। उन्होंने कहा कि मयंक सिंघल विधानसभा में कार्यरत है तथा लगातार पदोन्नति प्राप्त करते हुए राजपत्रित अधिकारी प्रथम श्रेणी पद पर आसीन है।
बिष्ट ने कहा है कि सूचना के अधिकार से जब इनके शैक्षणिक दस्तावेजों की जांच की जाती है तो गुरुकुल विश्वविद्यालय, वृन्दावन, मथुरा से दसवीं अधिकारी की परीक्षा व्यक्तिगत उत्तीर्ण दर्शाता है, जबकि उत्तराखंड एसआईटी ने वर्ष 2012 से 2016 तक नियुक्त शिक्षकों के प्रमाणपत्रों की जांच की थीऔर जिसमें यह तथ्य भी एसआईटी जाँच के दौरान प्रकाश में आया कि गुरुकुल वृन्दावन, मथुरा से दसवीं अधिकारी परीक्षा व्यक्तिगत माध्यम से नहीं कराई जाती है।
उन्होंने कहा कि एसआईटी ने जाँच रिपोर्ट शिक्षा निदेशालय को भेज दी थी, इसी प्रकार से सूचना के अधिकार के तहत सचिव माध्यमिक शिक्षा परिषद उत्तर प्रदेश ने भी स्पष्ट किया कि गुरुकुल विश्वविद्यालय वृन्दावन, मथुरा की 12वीं पंडित परीक्षा माध्यमिक शिक्षा परिषद उत्तर प्रदेश की इंटरमीडिएट परीक्षा के समकक्ष न तो पूर्व में मान्य थी और न ही वर्तमान में मान्य है।
उन्होंने कहा कि इस प्रकार 12वीं पंडित परीक्षा कभी भी मान्य रही ही नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रमाण पत्रों का मिलान करने पर पता चलता है कि इंटरमीडिएट पहले कर दिया गया और दसवीं बाद में की गई। उन्होंने कहा कि नियुक्ति देने वाले अधिकारियों की भी जांच होनी चाहिए।



