राजनीतिनामा: जानिए क्यूँ हरीश रावत को सीएम पद का चेहरा नहीं बना रहा है कॉंग्रेस आलाकमान?

पूर्व सीएम हरीश रावत के लिये पार्टी के बाहर ही नही अन्दर भी चुनौतियों का बढ़ना तय है । कम से कम कॉंग्रेस आलाकमान ने तो संकेत दे दिये हैं सामुहिक नेत्रत्व में चुनाव लड़ने की बात दोहराकर । बेशक हरदा प्रदेश में पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हों लेकिन 10 जनपथ को उनमे अपने बागी पूर्व सीएम कैप्टन अमरिन्द्र सिंह का ही अक्श नज़र आता है । दरअसल कमजोर नेत्रत्व के लिए ताकतवर सिपाहसालार कभी भी बड़ी चुनौती बन सकते हैं, और हरीश रावत कॉंग्रेस के ताकतवर सिपहसालारों में शामिल हैं | बड़ा कन्फ़्यूजन है भाई, पार्टी आलाकमान को प्रदेश के शीर्ष नेता पर भरोसा नहीं कि कहीं बागी न बन जाएँ, नेता को वरिष्ठ कार्यकर्ताओं पर भरोसा नहीं कहीं सीएम पद में चुनौती न बन जाएँ, कार्यकर्ताओं को मतदाता पर भरोसा नहीं कहीं मोदी लहर में न बह जाएँ …..अब मतदाता का भरोसा किस पर होगा आप ………..

राजनैतिक जानकार भी हैरान हैं कि पूर्व सीएम हरीश रावत का स्वयं को सीएम का चेहरा घोषित करने की लाख दलीलें देने, दिल्ली दरबार में भी शीर्ष नेताओं में गिनती होने और वर्तमान में उनके कद के आसपास किसी भी नेता के नहीं होने के वावजूद भी उन्हे पार्टी का चेहरा नहीं बनाया जा रहा है | असल में कॉंग्रेस आलाकमान भी यह जानता है कि यदि आज हरदा को चेहरा घोषित कर दिया जाये तो भी राज्य कॉंग्रेस में कोई विरोध नहीं होने वाला | लेकिन साथ ही उनको पूरा भरोसा भी है कि सत्ता आने की स्थिति में हरीश रावत का कद बाद जाएगा और सूबे में दिल्ली का दबदबा और कम हो जाएगा | चूंकि हरीश रावत डमी सीएम नहीं हो सकते हैं लिहाजा हरदा का पंजाब के पूर्व सीएम कैप्टन अमरिन्द्र सिंह की राह पर चलना तय है | इसलिए पार्टी का शीर्ष नेत्रत्व ही सीएम पद का चेहरा घोषित न करके राज्य में रावत विरोधी नेताओं को ताकत देने की रणनीति पर कार्य कर रहा है |

अब रहा सवाल हरीश रावत का तो उन्हे भी बखूबी इसका अंदाज़ा है कि जीतने की स्थिति में भी उनको सीएम बनाने के लिए पार्टी आलाकमान आसानी से नहीं मानने वाला | गर मान भी गया तो पंजाब में सिद्धू की तरह कई चेहरों को उनके विरोध के लिए शह दिया जाना तय है | यही वजह है कि रावत ने भाजपा से वापिसी करने के इच्छुक दिग्गजों के प्रवेश पर वीटो लगाया हुआ है | क्यूंकि उनको अंदाज़ा है है कि पार्टी में आने के इच्छुक सभी नेता उनसे ही जान बचाकर भाजपा में भागे थे | ऐसे में उनके आने से विरोधी कुनबे का बढ्न तय है | उनका दलित सीएम का दांव भी पार्टी आलाकमान और स्थानीय दिग्गजों को अपनी वैकल्पिक रणनीति जाहिर कर अपनी ताकत का एहसास कराना कि अगर पार्टी जीती तो इस बार वह ही सीएम होंगे अन्यथा विरोध करने वालों में से कोई नहीं होगा |

अभी तक के हालातों को देखकर तो यही लग रहा है कि कॉंग्रेस का चुनाव प्रचार भी दो धड़ों में होगा | पहला धड़ा हरीश रावत का होगा और दूसरा धड़ा आलाकमान की शाह वाला रावत विरोधी गुट होगा | ऐसे में प्रदेश की जनता के मन में क्या होगा अभी कहना मुश्किल है लेकिन परिस्थितियों यूं ही बनी रही तो कॉंग्रेस का विधानसभा चुनावों में नुकसान होना तय है |

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